Thursday, October 31, 2013

प्यार : वो भी था और ये भी है!!

उस ज़माने का प्यार ........
पेड़ों के इर्द गिर्द झूमता वो प्यार ........
उन पेड़ों की शाखाओं  पर बैठे दो पंछियों सा प्यार .........
वो प्यार ......
आपस में लिपटी फूलों की पंखुड़ियों के जैसा परस्पर वो प्यार ...........
चाँद को तोड़ लाने वाले वादों सा वो प्यार ...............
साथ जीने मरने की कसमों सा वो प्यार ................
वो प्यार ...........
प्रियतम के इंतज़ार में जलती बुझती शमा सा वो प्यार ..............
पहली छुअन के एहसासों से वक़्त के पैमाने पे थमा सा वो प्यार ..............
वो प्यार ...............
वो प्यार ना जाने कहाँ खो सा गया है !
इस ज़माने का प्यार ........
चुनाव से पहले बनती गलत - सलत नीतियों सा ये प्यार ...................
मीठे कि महक से सनक उठतीं 'लाल चीटियों' सा ये प्यार ..........
ये प्यार .........
पल पल बदलते फेसबुक के स्टेटस सा ये प्यार ...............
भावनाओं कि कसौटी पर बेबस सा ये प्यार .................
ये प्यार ...........
इस खोखले समाज के तानों सा ये प्यार ......
चोरी के फ़िल्मी गानों सा ये प्यार ........
शरीर पर लगी गुम चोट सा ये प्यार .......
किसी शातिर के दिल में छुपे खोट सा ये प्यार ............
ये प्यार ............
ना और लिख सकूंगा कि दिल के दर्द से स्याही भी लाल है .................
जो कभी पुख़ता सच था वो आज बस ख्याल है ..............
पर दिल दिलासा देता है कि ना घबरा मेरे दोस्त के अभी भी कुछ तो ठीक है…
ऐसे परवाने अभी भी ज़िंदा हैं जिनके लिए मुहब्बत पवित्रता कि गरिमा का प्रतीक है .............

3 comments:

  1. nice one prateek says a lot about the virtual world we r living in...

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  2. Nicely written..love how you don't lose hope..because hope is never lost, love always lives ! :)

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  3. Thanks for the comment Sezel. And, yeah hopefully my utopian ideology about love is a fact and not a hypothesis!

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